Monday, November 29, 2021

सामाजिक समानता, समरसता के गुरु संत रविदास जी के बारे में – By Rewa Times Now……..

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ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन।
पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।
कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन

बोधिसत्व गुरु  रैदास बौद्ध परम्परा के ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं 
Written by : बुद्धप्रिय Date : 2021-02-27
रायबरेली। चौदह सौ तैंतीस की माघ सुदी प्रदास।
दुखियों के कल्याण हित प्रकटे श्री रैदास।
माघी पूर्णिमा के दिन वाराणसी के सिर गोवर्धन नामक बस्ती में श्री रघुजी व मां करमाबाई की कोख से भारतभूमि पर संत रैदास का आविर्भाव हुआ. तुकाराम, नरसी-दादू, मेहता, गुरूनानक, कबीर, चोखा मेला, पीपादास, इन सभी मध्यकालीन सन्तों में प्रवर सदगुरू रैदास का स्थान श्रेष्ठ है.

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है. इस संस्कृति को जीवन्त रखने में भक्तिकाल या सन्त परम्परा का विशेष योगदान है. चेतना, जन आन्दोलन, समतामूलक समाज की परिकल्पना, मानव सेवा आदि क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए सन्त शिरोमणि रैदास का नाम बड़े आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता है. बोधिसत्व रैदास सामाजिक सुधार के लिए जीवन पर्यन्त जूझते तथा रचनात्मक प्रयत्न करते रहे. सामाजिक समानता, समरसता लाने के लिए वो अपनी वाणियों के माध्यम से तत्कालीन शासकों को भी सचेत करते रहे. घृणा और सामाजिक प्रताड़नाओं के बीच सन्त रैदास ने टकराहट और भेदभाव मिटाकर प्रेम तथा एकता का संदेश दिया. उन्होंने जो उपदेश दिये दूसरों के कल्याण व भलाई के लिए दिये और उनकी चाहत एक ऐसा समाज की थी जिसमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, दुख, कुटिलता का समावेश न हो. संत शिरोमणि रैदास कहते हैं:-
ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।
वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता सदगुरू रैदास की एक वैज्ञानिक सोच हैं, जो सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं। स्वराज ऐसा होना चाहिए कि किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो, एक साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था का निर्धारण हो इसके प्रबल समर्थक संत रैदास जी माने जाते हैं. उनका मानना था कि देश, समाज और व्यक्ति की पराधीनता से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है. पराधीनता से व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है. संकुचित विजन रखने वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की यथार्थ को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता है. वह पराधीनता को हेय दृष्टि से देखते थे और उनका मानना था कि तत्कालीन समाज व लोगों को पराधीनता से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए.

सन्त रैदास के मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति आक्रोश था. वह सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों के खिलाफ एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग करते थे. उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं होगी, वैचारिक विमर्श नहीं होगा. और जब तक यथार्थ की व्यवहारिक पहल नहीं होगी, तब तक इंसान पराधीनता से मुक्ति नहीं पा सकता है.

भारत की सरजमीं पर सदियों से जातिवादी व्यवस्था का प्राचीन इतिहास रहा है. जातिवादी व्यवस्था में मनुष्य एवं मनुष्य के बीच झूठा अलगाव उत्पन्न करके मानवता की हत्या कर दी गयी थी. जातिवादी व्यवस्था के पोषकों द्वारा देश या समाज हित में कोई भी क्रान्तिकारी कार्यक्रम ही नहीं दिये गये. इस कुटिल व्यवस्था के रोग को सदगुरू रैदास ने पहचाना. उन्होंने मानव एकता की स्थापना पर बल दिया. उनका मानना था कि जातिवादी व्यवस्था को बगैर दूर किये देश व समाज की उन्नति सम्भव नहीं है. ओछा कर्म और परम्परागत जाति व्यवस्था को रैदास ने धिक्कारा है. वह कहते थे कि मानव एक जाति है. सभी मनुष्य एक ही तरह से पैदा होते हैं. मानव को पशुवत जीवन जीने के लिए बाध्य करना कुकर्म की श्रेणी में आता है. कुकर्म से मनुष्य बुरा बनता है औक सत्कर्म से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है. जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को रैदास ने नकार दिया. उन्होंने कर्म प्रधान संविधान को अपने जीवन में सार्थक किया. सन्त रैदास ने सामाजिक परम्परागत ढांचे को ध्वस्त करने का प्रयास किया. रैदास कहते हैं:-
रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन।
पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।
इस वैज्ञानिक विचारधारा से तत्कालीन प्रभाव से समाज को मुक्ति मिली और आज भी इस विचारधारा का लाभ समाज को मिलता दिखाई दे रहा है. बल्कि 21वीं सदी में इसकी सार्थकता और भी बढ़ गयी है. समाज सुधार की आधारशिला व्यक्ति का सुधार है. सबसे पहले व्यक्ति को नैतिक दृष्टि से सीमाओं से ऊपर उठकर विवेक, बुद्धि आदि इस्तेमाल करना चाहिए, तभी समाज उन्नत हो सकेगा. व्यक्तिगत सद्चरित्रता, स्वच्छता तथा सरलता पर ध्यान देना चाहिए.

अपनी क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युग बोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धम्म दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक है. सन्त रैदास अपने समय से बहुत आगे थे. लोग उन्हें समझ नहीं पाये और न ही उनके कथनानुसार योजनाबद्ध तरीके से कोई कार्य कर पाये, जिससे सामाजिक या राजनैतिक क्रान्ति हो सके. वह समतामूलक समाज की कल्पना करते थे और मानते ते कि यह तभी संभव है जब सभी के सुख-दुःख का ख्याल रखा जाए. अज्ञानता के कारण प्रभाव स्थापित करने में लोग विभेद करते हैं. रैदास कहते हैं कि सभी जन एक ही मिट्टी के बने हैं और सभी के लिए ज्ञान का मार्ग खुला हुआ है.

अज्ञानता के आकाश को छूता समाज निजी स्वार्थ की पूर्ति में लीन था. एक-दूसरे में बैर भाव पैदा करके उसकी धन सम्पत्ति छीन ली जाती थी. अन्याय, अत्याचार, शोषण का चारों तरफ बोलबाला था. इन विषम परिस्थितियों में भी रैदास ने कभी किसी धन का अतिक्रमण नहीं किया. उन्होंने निःस्वार्थ रूप से जनता की भलाई की और धन संचय की प्रवृत्ति को कष्ट का कारण भी बताया रैदास कहते हैं:-
धन संचय दुःख देत है, धन मति तिआगे सुख होई।
रविदास सीख गुरूदेव की धन मति जौर कोइ।।
उपरोक्त दोहे के जरिए रविदास जी ने धन लोलुपता, संचय और असंतोष आदि अवगुणों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त किया. उन्होंने श्रम की महत्ता को बताया. उन्होंने आडम्बर पर भी करारा प्रहार किया. समाज को पथभ्रष्ट करने वाले पोंगापंथियों से सावधान रहने का सन्देश दिया और वाह्य आडम्बर, ढ़कोसला, परम्परा, रूढ़ियों, मूर्ति पूजा आदि का खण्डन किया. केवल दिखावा करके समाज को गुमराह करना, धोखा के अलावा कुछ नहीं है. इस प्रकार के बहुरूपीयेपन को दूर करके ही एक वैज्ञानिक मार्ग की दिशा व दशा का निर्धारण सम्भव हो सकता है. इसी सोच के कारण उन्होंने परम्परा, कट्टरता, हठधर्मिता और रूढ़ियों का परित्याग कर एक समन्वय विचारधारा का निर्धारण किया, जिससे हिन्दू मुस्लिम संस्कृति की विशाल खाई को पाटने में सहायता मिली. उन्होंने भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश को भावनात्मक एकता का संदेश दिया.

संत रैदास कर्म तथा स्वभाव दोनों से मानवतावादी थे. वह आज कल के समाज सुधारकों जैसे नहीं थे. उनको अपने प्रचार-प्रसार की लालसा नहीं थी. उन्होंने करुणा, मैत्री, प्रज्ञा, चेतना एवं वैचारिकता द्वारा देश के दीन-हीन अवस्था और भेदभाव को समूल समाप्त करने का सदैव प्रयास किया. उनका समदर्शी भाव, समाज उत्थान, निरीह प्राणियों की सेवा ही उत्कृष्ट मानवता थी. संत रैदास जी बचपन से ही सुधारात्मक प्रवृत्ति के थे. मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार जीवनपर्यन्त किया. रैदास जी कहते हैं कि जिस समाज में अविद्या है अज्ञानता है, उस समाज का उत्थान सम्भव नहीं है. मानव का स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रह सकता है. वास्तविक ज्ञान का प्रकाश विद्या से ही प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए सभी मानव को विद्या अर्जन करनी चाहिए.

उनका कहना है कि बुद्धि, विचार, विवेक के बिना सभी अन्धे के समान हैं. रैदास कई बार बुद्ध की बात को बढ़ाते दिखते हैं. तथागत ने भी तर्क की कसौटी पर परखने की बात कही है. वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता रैदास ने कहा मन ही सेऊं सहज स्वरूप तथागत बुद्ध ने धम्मपद की दो गाथाओं में भी यही बात कही, जिसका चित राग द्वेष आदि से निरपेक्ष विरत व स्थिर है, पाप-पुण्य निहित है उस पुरुष के लिए भय नहीं है. सन्तों की सुमिरिनी बौद्धों की स्मृति का ही दूसरा रूप है. क्रान्तिकारी रैदास ने बताया कि सिर मुड़ाने, पूजा करने, कठिन तपस्या करने, योग एवं वैराग्य से इच्छाओं का दमन नहीं होता है. यही बात तथागत बुद्ध ने भी अपने धम्मदेशना में बताई कि माया मोह व तृष्णा में लिप्त मनुष्य की शुद्धि न नंगे रहने से, न जटा रखने से, न कीचड़ लपेटने से, न उपवास करने से, न तपती धूप में सोने से, न धूल लपेटने से और न उकड़ूं बैठने से होती है. कई बार दिखता है कि रैदास ने तथागत बुद्ध से भी जबरदस्त प्रहार किया और वेद को नरक का द्वार बताया है. सन्त शिरोमणि रैदास कहते हैं कि ‘अरे मन तू अब अमृत देश को चल जहां न मौत है न शौक है और न कोई क्लेश. हे निरंजन निर्विकार मैं आपका जन हूं. लोक और वेद का खण्डन करके आपकी शरण में आया हूं. मज्झिम निकाय में भी इसी प्रकार की व्याख्या दी है जहां प्राणों का आयतन केवल अनन्त आकाश है. जहां प्राणी का आयतन केवल विज्ञान है, जहां प्राणी का आयतन अकिन्चन मात्र कुछ भी नहीं है और जहां न संज्ञा है, न आयतन और न नाम रूप.

महाकारुणिक शान्तिदूत तथागत बुद्ध से लगभग दो हजार वर्ष बाद पैदा हुए क्रान्तिकारी रैदास का जीवन ऊंच-नीच के भेदभाव, अन्धविश्वासों, कुप्रथाओं तथा आडम्बरों के विरोध में ही बीता था. उनकी वाणी एवं उपदेश, ब्राह्मण धर्म के खण्डन के पक्ष में और बुद्ध वचनों के समर्थन पक्ष में हैं. वस्तुतः रैदास बुद्ध वचनों से इतने प्रभावित थे कि कहीं न कहीं उन्होंने अपने पदों में बुद्ध वचनों को ही समाहित किया. वर्ण और जाति के भेदभाव को समाप्त करने के लिए महामानव बुद्ध के मानवीय एकता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया और कहा कि मनुष्य मात्र की एक ही जाति है इसमें किसी प्रकार की भिन्नता नहीं है.
बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बातानि बनानि च।
आराम रुक्ख चेत्यानि, मनुस्सा भय ताज्जिता।।
तथागत बुद्ध ने कहा- अन्धविश्वासों को त्यागो और प्रज्ञा पर आधारित मध्यम मार्ग अपनाओ. इसी तरह क्रान्तिकारी रैदास ने अन्धविश्वासों को त्यागने का आवाह्न किया.

कहा भयोनाचे अरू गाये, का भयो तय कीन्हें।
कहा भयो ये चरण पाखारे, जौ लौ परम तत्व नहि चीन्हें।।

तथागत बुद्ध ने सभी दुःखों का और अन्धविश्वासों का कारण अविद्या बताया. उन्होंने कहा कि अविद्या से प्रज्ञा या सद्भाव का प्रकाश रुक जाता है तभी दुःखों का जन्म होता है. तथागत ने कहा ‘अविद्या परमं मल्’. क्रान्तिकारी रैदास ने तथागत बुद्ध के उसी वचन को अपने शब्दों में ढ़ाल कर कहा –
अविद्या अहित की न, ताते विवेक दीप मलीन।
तथागत बुद्ध ने कहा है कि काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह ऐसे तत्व हैं जो अविद्या को बढ़ाते हैं. ये मनुष्य के प्रज्ञा में बाधक हैं. क्रान्तिकारी रैदास ने भी इसी बात को आगे बढ़ाया है और इन पांचों को लुटेरा कहा है- काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर, इन पांचों मिल लूटै.

तथागत बुद्ध ने मृगदाव वन में पंचवर्गीय भिक्खुओं को धम्म देशना देकर धम्म चक्र प्रवर्तनाय किया. उसी काशी में संत शिरोमणि रैदास ने राजा वीरसेन के दरबार में पोगापंथियों को पराजित किया. क्रान्तिकारी रैदास यदि बौद्ध परम्परा के नहीं होते तो उन्हें धार्मिक चुनौती नहीं स्वीकारनी पड़ती. सदगुरु रैदास साहेब बौद्ध परम्परा का ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं.

भारत का इतिहास बताता है कि श्रमण संस्कृति के पुरोधा श्री महावीर स्वामी और तथागत बुद्ध के सामने सभी ब्राह्मण संस्कृति के अनुयायी तुच्छ थे. तथागत बुद्ध के उदय से पहले वैदिक धर्म को ब्राह्मण संस्कृति कहा जाता है तथा संत धर्म, जैन धर्म एवं बौद्धों की संस्कृति को श्रमण संस्कृति कहा जाता है. लेखक चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने लिखा है कि “दोनों संस्कृतियों की मान्यता में धरती आकाश अथवा पूरब पश्चिम का अन्तर है. श्रमण संस्कृति अन्तर्मुख है और ब्राह्मण संस्कृति बहिर्मुखी है. श्रमण संस्कृति निवृत्ति प्रधान है, ब्राह्मण संस्कृति प्रवृत्ति प्रधान है. श्रमण संस्कृति संसार को दुःखपूर्ण समझकर इससे विमुक्त होने के लिए प्रयत्नशील है जबकि ब्राह्मण संस्कृति ‘भोगैश्वर्य’ परायण अर्थात संसार में भोग चाहती है, और मरने के बाद स्वर्गसुख. श्रमण संस्कृति जन्म मरण को भव बन्धन कहती हुई निर्वाण की कामना करती है, ब्राह्मण संस्कृति हजार साल की आयु और सुख भोग चाहती हैं और मरने पर अमर लोक में वास. क्रान्तिकारी रैदास साहब इसी श्रमण संस्कृति के हिमायती हैं और उन्होंने जीवन पर्यन्त इसी संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया तथा बोधिसत्व के रूप में ज्ञात हुए. रैदास साहेब के मानवतावादी सन्देश जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है.
कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन…संघप्रिय गौतम
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को ईश्वर बना डाला और खुद भक्त बन बैठे, नुक्सान ये हुआ की गुरु रविदास वाणी को पढ़ने की बजाय वो अपना पूरा समय गुरु रविदास के आगे ज्योति जलाने और प्रसाद बांटने में निकाल रहे है.
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को पढ़ा तो पाया की वो कोई ईश्वर या चमत्कारी पुरुष नहीं वरन एक क्रांतिकारी व्यक्ति थे जिन्होंने भारत में सामाजिक आंदोलन की ज्योति जलाई. इसलिए वो गुरु रविदास के अनुयायी बने.
उदाहरण देखिये, आज गुरु रविदास जयंती पर काफी साथियो ने गुरु रविदास की तस्वीर पोस्ट की है, उनमे ज्यादातर तस्वीरें वो है जो गुरु रविदास की दिखती है, किन्तु है नहीं.. माला और तिलक से सुसज्जित ये तस्वीरें गुरु रविदास के अनुसार किसी ठग की है.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”
मतलब “कोई व्यक्ति जिसने माथे पर तिलक लगाया है और हाथ में माला जप रहा है उसने समाज को ठगने के लिए ढोंग रचाया है, वह ठग है.”
और आप सब ऐसी ही तस्वीरें पोस्ट कर रहे हो इसका मतलब क्या है,
यही तो मतलब हुआ की आप भक्त है, अनुयायी नहीं है.
बौद्धिसत्व गुरु रविदास जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं……
एक विनती है, अगर आप आज गुरु रविदास जयंती की बधाई दे तो कृपा गुरु रविदास की तस्वीर ऐसी लगाये जिसमे माला या फिर तिलक ना हो, अन्यथा आप बधाई ही ना दे.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”…….
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